Social Media for Children: बच्चों पर सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने और नियंत्रित करने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

नई दिल्ली: सोशल मीडिया ने हमारे जीवन और दुनिया को बदल दिया है। हमारे कामकाज आसान बना दिया है और समाज में एक-दूसरे से जुड़ने की जटिल प्रक्रिया को बेहद सरल कर दिया है।
सीधे शब्दों में कहें तो सोशल मीडिया आज हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। ये हमारी आदत में शुमार है। लेकिन इसकी लत और दुष्प्रभाव के नतीजे भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। यदि बात बच्चों की हो तो सोशल मीडिया को लेकर नई चर्चा स्वाभाविक है। स्मार्ट फोन तक आसान पहुंच या मोबाइल की सुलभता के कारण आज बच्चे भी सोशल मीडिया की लत के शाकर हो रहे हैं।
कई स्टडी कह चुकी है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक बच्चे के विकास और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। बड़ी संख्या में पैरेंट्स बच्चों के मोबाइल की लत को लेकर बेहद चिंतित और परेशान भी रहते हैं।
इन सब चिंताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आज उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। यानि सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक बच्चों की पहुंच को नियंत्रित करने या रोकने से साफ मना कर दिया है।
हम आपको बताएंगे कि आखिर क्या है ये मामला, क्या थी ये याचिका और सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा इस मामले पर। इसके साथ ही हम ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर सोशल मीडिया मंचों पर आयु प्रतिबंध का क्या है नियम।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में ये जनहित याचिका एक गैर-लाभकारी संगठन जेप फाउंडेशन ने अधिवक्ता मोहिनी के जरिये दायर की थी। इस याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच को नियंत्रित करने के साथ ही इसके लिए मजबूत आयु सत्यापन प्रणाली, जैसे बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिका में ये भी मांग की गई थी कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर बच्चों की सुरक्षा नियमों का पालन न करने पर कड़ी सजा लागू की जाए।
अधिवक्ता मोहिनी प्रिया के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि देश में बच्चों में अवसाद, चिंता, आत्म-क्षति और आत्महत्या की दर में खतरनाक वृद्धि देखी जा रही है, अत्यधिक सोशल मीडिया का उपयोग और मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट के बीच सीधा संबंध सामने आ रहे हैं।
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इसलिए यह जरूरी है कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने से रोकने के लिए अनिवार्य और सत्यापन योग्य आयु प्रमाणीकरण तंत्र अपनाया जाना चाहिये। याचिका में कहा गया कि नाबालिगों द्वारा अनियमित सोशल मीडिया एक्सेस से जुड़े जोखिमों को कम करने और इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक और लागू करने योग्य ढांचा लागू किया जाना चाहिए।
याचिका में नाबालिगों के बीच सोशल मीडिया की लत को रोकने के लिए ऑस्ट्रेलिया, यूके और कई अमेरिकी राज्यों में शुरू किए गए सख्त वैधानिक निषेध और नियामक ढांचे का भी हवाला दिया गया।
याचिका में दावा किया गया कि नाबालिगों का अनियंत्रित डिजिटल जुड़ाव एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के समान है, जिसके लिए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका शुक्रवार को सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जज बीआर गवई और एजी मसीह की पीठ ने याचिका पर इस विचार करने से साफ इनकार कर दिया। दो जजों की बेंच ने कहा कि ये नीतिगत का मामला है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संसद से कानून बनाने के लिए कहने की सलाह दी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को सरकार से संबंधित प्राधिकरण और अधिकारियों के पास जाने की स्वतंत्रता भी दी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए बड़ी टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत नीति-निर्माण के दायरे में आती है और याचिकाकर्ता को सरकार में संबंधित अधिकारियों के समक्ष ये मामला उठाना चाहिये।
कोर्ट ने ये भी कहा कि यदि याचिका में कोई प्रस्तुति दी जाती है तो उसे आठ सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में ये भी कहा गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वर्तमान में एक मामूली आयु प्रतिबंध लगाते हैं, जिसके तहत अकाउंट बनाने के लिए उपयोगकर्ताओं की आयु कम से कम 13 वर्ष होनी चाहिए, लेकिन इस आवश्यकता को पर्याप्त रूप से लागू नहीं किया जाता है, क्योंकि निर्धारित आयु सीमा से कम उम्र के बच्चों द्वारा बनाए गए अकाउंट की पहचान केवल तभी की जाती है, जब उपयोगकर्ता रिपोर्ट के माध्यम से उन्हें चिन्हित किया जाता है।
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मौजूदा स्थितियों में नाबालिगों की सोशल मीडिया मंचों पहुंच बेहद आसान है, वो भी किसी रोक-टोक के बिना। सोशल मीडिया कंपनियों ने ऐसा कोई मजबूत मैकनिज्म तैयार नहीं किया है, जिससे बच्चों की उस तक पहुंच को रोकी जा सकी।
गाड़ी चलाने, वोट डालने और शराब पीने जैसी उम्र-विनियमित गतिविधियों के विपरीत, सोशल मीडिया काफी हद तक आज भी अनियंत्रित है, जिससे बच्चों को कई तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
यदि किसी पैरेंट का सोशल मीडिया पर अकाउंट है और उसका स्मार्ट फोन बच्चों के हाथ में तो बच्चों को सोशल मीडिया से कोई नहीं रोक सकता है।
ये भी सच है कि सोशल मीडिया पर बच्चों की मौजूदगी और सक्रियता फिजिकल, मेंटल हेल्थ और रिलेशनशिप को भी प्रभावित कर सकती है।
बच्चों में मोबाइल की लत बिहेवियर इश्यू को भी बढ़ा रही है। इन सबके बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया तक बच्चों की पहुंच को रोकने या नियंत्रित करने की याचिका को खारिज कर दिया।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ होता है कि हमारे देश में अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं बना, जो बच्चों को सोशल मीडिया के इस्तेमाल से रोकता हो लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव खासकर बच्चों के मामले में सामने आ रहे हैं, उससे देर-सबेर इस रोक लगानी जरूरी हो सकती है और सरकार को सख्त कानून भी बनाने पड़ सकते हैं।