वन विभाग में खुशी की लहर! प्रभागीय वनाधिकारी हिमांशु ने दी बड़ी जानकारी; जानिये क्या

डीएन ब्यूरो

प्रभागीय वनाधिकारी हिमांशु बागड़ी ने बड़ी जानकारी दी है। इससे वन विभाग में खुशी की लहर देखने को मिल रही है। पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

उत्तराखंड के जंगलों में दिखी विलुप्तप्राय फिशिंग कैट
उत्तराखंड के जंगलों में दिखी विलुप्तप्राय फिशिंग कैट


हल्द्वानी : उत्तराखंड के तराई पूर्वी वन प्रभाग के जंगलों से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बड़ी और उत्साहवर्धक खबर सामने आई है। यहां पहली बार लुप्तप्राय और दुर्लभ प्रजाति की फिशिंग कैट (प्रियोनैलुरस विवरिनस) देखी गई है। इस जंगली बिल्ली को वन विभाग की गश्ती टीम ने सितारगंज रेंज के बाराकोली क्षेत्र में देखा। विभागीय टीम ने इसे सुरक्षित रेस्क्यू कर रानीबाग स्थित रेस्क्यू सेंटर में उपचार दिया और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद वापस जंगल में छोड़ दिया।

फिशिंग कैट क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, फिशिंग कैट एक विशेष प्रकार की जंगली बिल्ली है, जो मुख्य रूप से जल स्रोतों के आसपास पाई जाती है और मछली पकड़ने में माहिर होती है। यह प्रजाति आमतौर पर भारत के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में देखी जाती है, लेकिन उत्तराखंड में इसकी मौजूदगी बेहद दुर्लभ मानी जाती है। प्रभागीय वनाधिकारी हिमांशु बागड़ी के अनुसार यह बिल्ली सामान्य घरेलू बिल्ली से चार गुना बड़ी होती है और इसका शरीर पानी में शिकार करने के लिए अनुकूलित होता है। इसकी झिल्लीदार उंगलियां इसे कुशल तैराक बनाती हैं, जिससे यह पानी में भी आसानी से शिकार कर सकती है।

आईयूसीएन की 'लुप्तप्राय' सूची में सूचीबद्ध

आईयूसीएन (अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ) द्वारा फिशिंग कैट को 'लुप्तप्राय' श्रेणी में रखा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस प्रजाति का अस्तित्व गंभीर खतरे में है। इसका मुख्य कारण इसके प्राकृतिक आवासों का विनाश, जल स्रोतों का प्रदूषण, शिकार और अवैध तस्करी है। भारत में यह मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में देखी जाती है, लेकिन अब उत्तराखंड में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।

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रात में सक्रिय, अपने क्षेत्र की सीमाएं खुद तय करती है

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार फिशिंग कैट मुख्य रूप से रात्रिचर होती है, यानी रात में यह ज्यादा सक्रिय रहती है। यह छोटी मछलियों, उभयचरों, पक्षियों और अन्य छोटे जीवों का शिकार करता है। दिलचस्प बात यह है कि यह अपने क्षेत्र की सीमाएं खुद ही तय करता है और अक्सर गीले इलाकों में रहना पसंद करता है। इसके पंजे और शारीरिक संरचना इसे न केवल एक बेहतरीन शिकारी बनाती है, बल्कि इसे अन्य बिल्लियों से अलग भी बनाती है।

उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण जैव विविधता संकेतक

वन विभाग ने इस खोज को राज्य की जैव विविधता के लिए एक अच्छा संकेत बताया है। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में इस दुर्लभ प्रजाति को पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था, जिससे यह घटना और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यह खोज इस बात की ओर इशारा करती है कि उत्तराखंड के जंगल अभी भी दुर्लभ वन्यजीवों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान कर रहे हैं।

वन विभाग करेगा विस्तृत अध्ययन

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फिशिंग कैट की मौजूदगी के बाद अब वन विभाग इस प्रजाति पर विस्तृत अध्ययन करने की योजना बना रहा है। इसके तहत वन क्षेत्र में इस प्रजाति की आबादी, उनके प्राकृतिक आवास और व्यवहार पर शोध किया जाएगा। इसके अलावा जल स्रोतों के संरक्षण और वन्यजीवों के लिए अनुकूल वातावरण बनाए रखने के लिए भी विशेष प्रयास किए जाएंगे।

अन्य देशों में भी पाई जाती है यह दुर्लभ बिल्ली

फिशिंग कैट सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, चीन, नेपाल और कुछ अन्य दक्षिण एशियाई देशों में भी पाई जाती है। इन सभी देशों में इसके शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध है, फिर भी अवैध शिकार और पर्यावरणीय समस्याओं के कारण इसकी संख्या तेजी से घट रही है।

वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक पहल

उत्तराखंड के जंगलों में इस दुर्लभ प्रजाति की मौजूदगी को वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में इसके संरक्षण के लिए उचित उपाय किए जाएं तो यह प्रजाति लंबे समय तक अस्तित्व में रह सकती है। वन विभाग की इस सफलता ने न सिर्फ उत्तराखंड की जैव विविधता को और समृद्ध किया है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि यहां के जंगल अभी भी दुर्लभ वन्यजीवों को सुरक्षित आश्रय प्रदान कर सकते हैं।










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